मिर्ज़ा ग़ालिब
- इश्क़ पर ज़ोर नहीं , है ये वो आतिश ‘ ग़ालिब ‘ , जो लगाए न लगे , और बुझाए न बने
- हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वो कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नही होता…
- कहते हैं इश्क़ जिसको, खलल है दिमाग़ का
- मैं ने माना की, कुछ नहीं “ग़ालिब”, मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है..
- उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पे रौनक
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।
देखिए पाते हैं उशशाक़ बुतों से क्या फ़ैज़
इक बराह्मन ने कहा है कि ये साल अच्छा है।
हमको मालूम है जन्नत की हक़ीकत लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है।
कुछ तो मजबूरियाँ रही होगी
यूँ कोई बेवफा नही होता
आपना दिल भी टटोल कर देखो
फासला बेवजह नही होता
Bashir Badra
धड़कने लगा था फिर से सीने में बेज़ारे दिल , खंजर दिखा के मैने चुप करा दिया
Self